Brand: Suruchi Prakashan
Product Code: Suruchi-3755
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यह पुस्तक “दिल्ली का हिंदू इतिहास” दिल्ली की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान को पुनः समझने का एक गंभीर और गहन शोधपरक प्रयास है। यह कृति केवल घटनाओं का साधारण वर्णन नहीं करती, बल्कि दिल्ली के अतीत को एक व्यापक सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पुनः स्थापित करने का प्रयत्न करती है। लेखक का मानना है कि समय के साथ इतिहास-लेखन की कुछ प्रवृत्तियों ने दिल्ली के प्राचीन स्वरूप को सीमित कर दिया और उसे मुख्यतः सल्तनत तथा मुगल काल की राजनीतिक घटनाओं तक ही केंद्रित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप उस दीर्घकालिक सांस्कृतिक परंपरा की उपेक्षा हुई, जो इन्द्रप्रस्थ से लेकर मध्यकालीन हिंदू राजवंशों तक निरंतर विकसित होती रही।

पुस्तक में दिल्ली के इतिहास को इन्द्रप्रस्थ की परंपरा से आरंभ करते हुए उसके सांस्कृतिक विकास की एक दीर्घ यात्रा प्रस्तुत की गई है। महाभारत में वर्णित इन्द्रप्रस्थ को केवल पौराणिक आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृति के रूप में समझने का प्रयास किया गया है। लेखक विभिन्न पुरातात्त्विक खोजों, स्थलपरंपराओं, शिलालेखों तथा प्राचीन ग्रंथों के आधार पर यह संकेत करते हैं कि दिल्ली का भूभाग प्राचीन काल से ही वैदिक सभ्यता, धार्मिक अनुष्ठानों, गुरुकुलों और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें तोमर, चौहान एवं मराठा जैसे हिंदू राजवंशों की भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला गया है। अनंगपाल तोमर द्वारा स्थापित लौह स्तम्भ, लालकोट जैसे किलों का निर्माण, मंदिरों और जलसंरचनाओं की स्थापना तथा ग्राम व्यवस्था का विकास दिल्ली के उस ऐतिहासिक स्वरूप को सामने लाते हैं जो लंबे समय तक उपेक्षित रहा। पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में भी दिल्ली केवल एक सैन्य शक्ति का केंद्र नहीं थी, बल्कि वह सांस्कृतिक गतिविधियों, विद्या, स्थापत्य और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बनी रही।

पुस्तक यह भी दर्शाती है कि दिल्ली के आसपास के ग्राम, मंदिर, तीर्थस्थल और स्थानीय परंपराएँ इस क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता के साक्ष्य हैं। लेखक विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों जैसे पुरातात्त्विक उत्खनन, ताम्रपत्र, विदेशी यात्रियों के विवरण और लोकस्मृतियों के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि दिल्ली की पहचान बहुस्तरीय रही है और उसे केवल एक सीमित ऐतिहासिक कालखंड से जोड़कर नहीं समझा जा सकता।

इस प्रकार “दिल्ली का हिंदू इतिहास” केवल अतीत का पुनर्निर्माण नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक चेतना और भारतीय इतिहास-बोध को पुनः समझने का एक महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयास है। यह पुस्तक पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि किसी भी नगर का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं से नहीं बनता, बल्कि उसकी सभ्यता, परंपराओं और सामाजिक स्मृतियों से भी निर्मित होता है।

 

 

 

 

This book offers a compelling and well-documented exploration of history, faith, and civilizational continuity rooted in the legacy of Shri Ram and the cultural foundations of Bharat. It traces the rise of the Dogra dynasty beginning with Maharaja Gulab Singh-described as a descendant of Shri Ram. By 1947, this state had emerged as the largest princely state in the Bharatiya subcontinent. The narrative also records how Maharaja Hari Singh acceded this strategically vital state to the Dominion of Bharat, a decision of immense historical and geopolitical significance.

Drawing upon historical sources such as the Imperial Gazetteer and Census records, the book highlights the vast territorial extent of the state and the wider influence of the Dogra rulers. It also documents their contribution to preserving Bharatiya culture through the construction of mandirs, sacred institutions, and the promotion of Sanatan traditions across the region.

The work further presents a researched account of sacred sites, Ram Mandirs, and other places of worship across Jammu and Kashmir, including the challenges they faced during periods of political upheaval, militancy, and the displacement of the Kashmiri Hindu community.

A major section of the book examines the geographical and historical trails of the Ramayan across Bharat and Sri Lanka. Supported by archaeology, geography, and archeo-astronomy, it discusses sacred locations connected with Shri Ram, Sita, and Hanuman, including Ram Setu and other significant sites. Through historical evidence, photographs, and analytical discussion, the book presents a powerful narrative that highlights the enduring spiritual and civilizational legacy of Sanatan Dharm.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी रानी भी थीं जो अपनी प्रजा को अपनी संतान मानती थीं? जिनका दरबार सबके लिए खुला था और जिनकी बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं? आइए, इस रोमांचक कॉमिक के जरिए चलते हैं पुराने समय के मालवा में! जहाँ हम देखेंगे वीरता, न्याय और दया की प्रतिमूर्ति अहिल्याबाई का अद्भुत सफर, एक नन्हीं बच्ची से महान शासिका तक।

इस रंगीन कॉमिक में देखिए रानी अहिल्याबाई के बचपन की घटनाएं, उनका साहस और प्रजा के प्रति उनका अटूट प्यार। पढ़िए कहानी उस रानी की जिसने राज्य पर अनेकों मुसीबत आने के बाद भी कभी हार नहीं मानी और दिखाया कि एक नारी, शक्ति बुद्धि और साहस के समन्वय से कैसे साम्राज्य चला सकती है।

महेश्वर के घाटों से लेकर भव्य मंदिरों के निर्माण तक, यह कहानी है भारत की उस 'महारानी' की, जिन्होंने शांति और धर्म से सबका दिल जीता। जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से 'लोकमाता' कहने लगे।

Product Details
ISBN 9789375850472
Pages 40
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Language Hindi
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