Brand: Suruchi Prakashan
Product Code: Suruchi-3763
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भारतीय राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में विनायक दामोदर सावरकर (28 मई 1883 – 26 फ़रवरी 1966) एक ऐसा नाम है जो प्रशंसा और आलोचना के वृत्त को आच्छादित करता है। उनके विविध आयामों का विस्तार किसी परिधि में नहीं देखा जा सकता। वे केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं अपितु इतिहासकार, बैरिस्टर, चिंतक, उपन्यासकार, कवि एवं प्रख्यात राजनीतिक नेता भी थे। ऐसे बहुआयामी, प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व पर किसी भी प्रकार का शोध करना समुद्र की गहराई में कंकड़ की खोज करने के समान दुष्कर एवं दुरूह कार्य है।
राजनीतिक विभूतियों के जीवन-अध्ययन की रुचि ने हमें सावरकर पर अनुसंधान करने के लिए प्रेरित किया। कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि वीर सावरकर जैसे महापुरुष पर लिखने का साहस कर सकूँगा परंतु उनके जीवन का अनुशीलन करते हुए अनेक दुर्लभ एवं अप्रकाशित दस्तावेज़ प्राप्त हुए। उन सबको एकत्रित करने पर यह सामग्री स्वतः ही एक ग्रंथ का रूप ले बैठी।
शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठन में दयित्वान कार्यकर्त्ता (पूर्णकालिक कार्यकर्ता ) के रूप में कार्य करते हुए मुझे पश्चिम बंगाल में गहन प्रवास का अवसर मिला। इस प्रवास के दौरान पश्चिम बंगाल की राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों से परिचय हुआ। वर्तमान में पश्चिम बंगाल पहले का बंगाल प्रोविएंस नहीं है जो भारत की आर्थिक व सांस्कृतिक राजधानी थी और सन् 1911 ई. तक ईस्ट इंडिया कंपनी की राजधानी रही है। भारत की स्वतंत्रता के लिए होने वाले आन्दोलनों का केंद्र  बंगाल/कोलकाता ही रहा है। कलकत्ता या कोलकाता एक समय राष्ट्रवादी नेताओं का गढ़ था। यदि यह कहा जाए की कोलकाता जो ईस्ट इंडिया की राजधानी के साथ ही राष्ट्रवादी नायकों की भी राजधानी रही है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। अनेक जननायकों की जन्मस्थली व कर्म स्थली “बंगाल” आज आर्थिक, राजनितिक व सामाजिक तीनो रूप से शेष भारत से कई क्षेत्रों में पिछड़ चुका है। बंगाल एक समय भारत का सिरमौर था और बंगाल में हिन्दुओं के अनेक सर्वमान्य नेता भी रहे हैं। ऐसे हिन्दू जननायक नेता रहे हैं जो बंगालियों के हृदय में वास करते थे, बंगालियों को उन तमाम हिन्दू जननायकों पर गर्व था ऐसे जननायकों को बंगालियों ने सर- आँखों पर बैठाया... इन्हीं में एक प्रमुख हिन्दू नायक का नाम है “विनायक दामोदर सावरकर”। बंगालियों के एक बड़े हिन्दू जननायक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी सावरकर को अपना नेता मानते थे। देश आज वीर सावरकर जी की 115 वीं  वर्षगांठ मना रहा है... तब यह पुस्तक और प्रासंगिक हो जाती है। यद्यपि  आज़ादी के बाद 1970 तक बंगाल के हिन्दुओं के ह्रदय में वास करने वाले वीर सावरकर, बंगाल की सत्ता में वामपंथियों के आने के साथ ही हिन्दुओं के जननायक से इतिहास में खलनायक के रूप में प्रस्तुत किए गए... वामपंथियों ने ऐसा इतिहास बनाया/लिखा की बंगाली हिन्दुओं ने सावरकर को आत्मविस्मृत कर दिया। यह पुस्तक वीर सावरकर द्वारा हिन्दू महासभा में किए गए कार्यों एवं उनके हिन्दूराष्ट्र के लिए प्रस्तुत विचारों को सामने लाने का एक गिलहरी प्रयास है... साथ ही यह पुस्तक बंगालियों से यह आग्रह भी करती है कि वह अपनी आत्मविस्मृति की धूल झाड़कर अपने गौरवपूर्ण अतीत के आलोक को प्रसारित करें।

Product Details
ISBN 978-93-75857-64-8
Pages 778
Binding Style Perfect Paperback
Language Hindi
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